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पौराणिक कथाओं में समुद्र मंथन की घटना का बहुत बड़ा महत्व है. जब देवताओं और असुरों ने मिलकर समुद्र को मथा, तो उसमें से एक से बढ़कर एक चमत्कारी चीजें बाहर आईं.
ज्यादातर लोग ये जानते हैं कि समुद्र मंथन से माता लक्ष्मी और अमृत निकला था. लेकिन इस मंथन से सिर्फ अच्छी और शुभ चीजें ही नहीं निकली थीं. इसमें से कुछ ऐसी भयानक और विनाशकारी शक्तियां भी बाहर आई थीं, जिन्हें देखकर देवता और दानव दोनों ही कांप उठे थे.
इनमें से तीन चीजें इतनी ज्यादा खतरनाक थीं कि देवताओं ने उन्हें छूने तक से साफ मना कर दिया था. आइए जानते हैं समुद्र मंथन से निकले उन तीन भयानक रत्नों का रहस्य.
कालकूट नाम का भयंकर विष
समुद्र मंथन की शुरुआत में ही जो सबसे पहली चीज बाहर आई, वह था कालकूट नाम का भयंकर जहर. ये कोई साधारण विष नहीं था, बल्कि इसकी गर्मी और धुएं से तीनों लोक जलने लगे थे.
इस विष का असर इतना तेज था कि देवता और असुर दोनों ही अपनी जान बचाकर भागने लगे. किसी भी देवता या दानव में इतनी हिम्मत नहीं थी कि वह इस जहर को हाथ भी लगा सके.
तब सृष्टि की रक्षा के लिए भगवान शिव आगे आए. उन्होंने इस कालकूट विष को अपने हाथ में लिया और पूरा पी गए. माता पार्वती ने शिव जी के गले को दबाकर उस जहर को पेट में जाने से रोका, जिससे उनका गला नीला पड़ गया और वे नीलकंठ कहलाए.
वारुणी यानी मदिरा की उत्पत्ति
मंथन के दौरान समुद्र की गहराइयों से एक और ऐसी चीज निकली, जिसे देवताओं ने अपनाने से पूरी तरह इंकार कर दिया. ये चीज थी वारुणी, जिसे मदिरा या शराब कहा जाता है.
वारुणी जब समुद्र से बाहर आई, तो वह एक देवी के रूप में प्रकट हुई थी. वह पूरी तरह से नशे और तामसिक प्रवृत्तियों को बढ़ावा देने वाली शक्ति थी. देवता जानते थे कि मदिरा का सेवन करने से बुद्धि नष्ट हो जाती है और इंसान या देवता अपने सही मार्ग से भटक जाते हैं.
इसलिए पवित्र आचरण रखने वाले देवताओं ने वारुणी को छूने से मना कर दिया. अंत में असुरों ने आगे बढ़कर इस मदिरा को सहर्ष स्वीकार कर लिया.
ज्येष्ठा यानी दरिद्रता की देवी
समुद्र मंथन से जब धन और ऐश्वर्य की देवी माता लक्ष्मी प्रकट हुईं, तो हर कोई खुश था. लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि माता लक्ष्मी से ठीक पहले समुद्र से उनकी बड़ी बहन भी निकली थीं.
इनका नाम ज्येष्ठा था, जिन्हें अलक्ष्मी, मूदेवी या दरिद्रता की देवी भी कहा जाता है. ज्येष्ठा का रूप बहुत डरावना था और उनके प्रकट होते ही चारों तरफ उदासी और कंगाली छाने लगी.
वे जहां भी जातीं, वहां दुख, बीमारी और दरिद्रता अपने आप आ जाती थी. उनके इस विनाशकारी स्वभाव के कारण देवताओं ने उन्हें अपने साथ रखने या छूने से बिल्कुल मना कर दिया. बाद में उन्हें एक ऋषि को सौंप दिया गया और वे पीपल के पेड़ के नीचे रहने लगीं.
विनाश के बाद ही मिला अमृत
इस तरह समुद्र मंथन की पूरी कहानी हमें जीवन का एक बहुत बड़ा सच सिखाती है. जब भी हम किसी बड़े बदलाव या मंथन से गुजरते हैं, तो सबसे पहले बुराई और विनाशकारी चीजें ही सामने आती हैं.
देवताओं ने धैर्य रखा और इन तीनों खतरनाक शक्तियों यानी कालकूट विष, वारुणी और ज्येष्ठा से दूरी बनाए रखी. उन्होंने अपनी पवित्रता को नहीं खोया और गलत चीजों के लालच में नहीं पड़े.
यहीं कारण था कि इतनी बड़ी बड़ी बाधाओं और भयानक खतरों को पार करने के बाद अंत में देवताओं को वह दिव्य अमृत और माता लक्ष्मी की कृपा प्राप्त हो सकी.
(Disclaimer- यह सामग्री धार्मिक ग्रंथों, व्रत कथाओं, पौराणिक प्रसंगों एवं प्रचलित मान्यताओं पर आधारित है. विभिन्न ग्रंथों, क्षेत्रों, परंपराओं और विद्वानों के मतानुसार कथाओं एवं उनके विवरण में अंतर संभव है. इसका उद्देश्य धार्मिक, सांस्कृतिक एवं शैक्षिक जानकारी प्रदान करना है.)
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