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उपेंद्र द्विवेदी, महोबा: पाकिस्तान को करारी शिकस्त देकर भारतीय सेना ने 1999 के कारगिल युद्ध में टाइगर हिल पर तिरंगा फहराकर इतिहास रचा था। आज देश कारगिल विजय दिवस मना रहा है और इस मौके पर उत्तर प्रदेश के महोबा जिले के पूर्व कमांडो रविंद्र सिंह ने उस भीषण युद्ध की यादें साझा कीं। टाइगर हिल फतह करने वाली टीम का हिस्सा रहे रविंद्र सिंह बताते हैं कि कारगिल की पहाड़ियों पर हर कदम मौत के साए में उठता था, लेकिन भारतीय जवानों का हौसला कभी नहीं टूटा। मातृभूमि की रक्षा के लिए महोबा के दो वीर सपूत जगदीश यादव और बालेंद्र सिंह ने भी अपने प्राण न्योछावर कर दिए थे।
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टाइगर हिल पर फहराया था तिरंगा
महोबा निवासी रविंद्र सिंह भारतीय सेना की पैरामिलिट्री कमांडो फोर्स का हिस्सा थे। कारगिल युद्ध के दौरान उनकी टीम ने टाइगर हिल पर कब्जा जमाए बैठे पाकिस्तानी सैनिकों को पीछे हटाते हुए भारतीय तिरंगा फहराया। वह बताते हैं कि यह मिशन बेहद कठिन था, लेकिन भारतीय सैनिकों के साहस और रणनीति ने दुश्मन की हर चाल को नाकाम कर दिया।
युद्ध की याद आज भी कर देती है रोमांचित
रविंद्र सिंह बताते हैं कि कारगिल युद्ध के भयावह दृश्य आज भी उनकी आंखों के सामने ताजा हैं। मातृभूमि की रक्षा करते हुए कई साथी वीरगति को प्राप्त हुए, लेकिन किसी ने पीछे हटने का नाम नहीं लिया। उनका कहना है कि देश के लिए प्राण न्योछावर करने वाले अमर बलिदानियों की गाथा हमेशा इतिहास में अमर रहेगी।
1996 में सेना में भर्ती, फिर बने कमांडो
रविंद्र सिंह का जन्म 1 अप्रैल 1977 को महोबा में हुआ। वर्ष 1996 में राजपूताना राइफल्स में भर्ती होने के बाद 1997 में उनका चयन 21 पैरामिलिट्री कमांडो फोर्स में हुआ। फरवरी 2012 में वह सेना से सेवानिवृत्त हुए। वर्तमान में वह महोबा शहर के आलमपुरा मोहल्ले में अपने परिवार के साथ रहते हैं।
'साथी की पीठ पर गिरा गोला और वह शहीद हो गए'
रविंद्र सिंह बताते हैं कि अप्रैल 1999 में उनकी 250 कमांडो की टुकड़ी असम के जोरहाट से श्रीनगर होते हुए द्रास सेक्टर पहुंची। युद्ध के दौरान महोबा निवासी कमांडो जगदीश यादव दुश्मन से मुकाबला करते हुए आगे बढ़ रहे थे, तभी उनकी पीठ पर गोला गिरा और वह वीरगति को प्राप्त हो गए।
वहीं महोबा के गंज गांव निवासी बालेंद्र सिंह भी जम्मू-कश्मीर के आरएसपुरा सेक्टर में पाकिस्तान से लोहा लेते हुए शहीद हो गए। दोनों वीर सपूतों का बलिदान आज भी जिले के लिए गर्व का विषय है।
'सिर उठाते ही दुश्मन गोली चला देता था'
पूर्व कमांडो बताते हैं कि उन्हें 12-12 जवानों की टुकड़ियों में आगे बढ़ने का आदेश मिला था। छह जवान आगे बढ़ते थे और बाकी छह उन्हें कवर देते थे। दुश्मन ऊंची पहाड़ियों पर तैनात था, जबकि भारतीय जवान नीचे से चट्टानों से चिपककर आगे बढ़ते थे।
उन्होंने कहा, "अगर गलती से भी सिर ऊपर उठ जाता था तो दुश्मन की गोली का निशाना बनना तय था।" इसलिए दिन में चट्टानों के बीच छिपकर और रात में नक्शे के सहारे आगे बढ़ना पड़ता था।
ढाई दिन की कठिन चढ़ाई के बाद मिली जीत
रविंद्र सिंह के अनुसार, भारतीय जवानों को सूचना मिली थी कि पाकिस्तानी सैनिकों ने टाइगर हिल पर कब्जा कर रखा है और वहीं से लगातार भारतीय सेना पर फायरिंग कर रहे हैं। ऊंची चढ़ाई और लगातार गोलाबारी के बीच भारतीय कमांडो दिन में छिपते और रात में आगे बढ़ते रहे।
करीब ढाई दिन की कठिन चढ़ाई के बाद 24 कमांडो टाइगर हिल की चोटी तक पहुंचे और जुलाई 1999 में वहां भारतीय तिरंगा फहराकर मिशन पूरा किया।
इन वीरों ने मिलकर लिखी जीत की कहानी
रविंद्र सिंह ने बताया कि टाइगर हिल पर तिरंगा फहराने वाली टीम में उनके साथ कमांडो सुरेंद्र सिंह, ओमवीर सिंह, सत्ते सिंह विष्ट, महावीर सहित कई अन्य जांबाज शामिल थे। उन्होंने कहा कि कारगिल की जीत केवल सेना की नहीं, बल्कि पूरे देश के साहस, एकजुटता और बलिदान का प्रतीक है।
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