टॉपर बनना कोई पैदाइशी हुनर नहीं, ये 5 माइंडसेट औसत छात्रों को भी बना देते हैं कामयाब
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सफलता का असली रहस्य किताबों के ढेर या परीक्षा के अंकों में नहीं, बल्कि आपके दिमाग के उस 'कंट्रोल रूम' में छिपा है जिसे हम माइंडसेट कहते हैं। ज्यादातर लोगों को लगता है कि टॉपर बच्चों में अनुवांशिक गुण छिपे होते हैं। लेकिन आधुनिक शोध इस धारणा को सिरे से खारिज करते हैं। दरअसल , एक औसत छात्र और एक टॉपर बच्चे के बीच का सबसे बड़ा अंतर उनकी मेहनत नहीं, बल्कि चुनौतियों को देखने का उनका नजरिया होता है। जब आप अपनी क्षमताओं को 'स्थिर' मानने की जगह उन्हें 'विकसित' करने वाला मान लेते हैं, तो दिमाग के सीखने की गति अपने आप बढ़ जाती है। एक्टिव रिकॉल और सेल्फ-रेगुलेशन जैसे वैज्ञानिक तरीके केवल तकनीकें नहीं हैं, बल्कि ये आपके मस्तिष्क को फिर से 'वायर' करने के साधन हैं। आइए जानते हैं 5 ऐसे माइंडसेट, जो किसी भी छात्र के सीखने की क्षमता को बदलकर उसके औसत से टॉपर बनने के सफर को तय करने का हौसला दे सकते हैं।
5 माइंडसेट शिफ्ट्स, जो छात्रों को बनाते हैं टॉप परफॉर्मर
'स्मार्ट हूं या नहीं' से 'मैं ग्रो कर सकता हूं' की ओर शिफ्ट
कई छात्र सोचते हैं कि इंटेलिजेंस फिक्स्ड है,जबकि सफलता की राह में यह सोच गलत और हानिकारक है। ग्रोथ माइंडसेट में विश्वास करें कि मेहनत से क्षमताएं बढ़ाई जा सकती हैं। इसके लिए 'मैं इसमें अच्छा नहीं हूं' की जगह 'मैंने इसे अभी तक मास्टर नहीं किया है' सोचें। गलतियों को सीखने का मौका मानकर आगे बढ़ते चलें।
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पैसिव रीडिंग से एक्टिव रिट्रीवल की ओर शिफ्ट
नोट्स बार-बार पढ़ना कम प्रभावी है, याद करके निकालना (एक्टिव रिकॉल) बेहतर है। इसके लिए आप खुद को क्विज करें, फ्लैशकार्ड्स इस्तेमाल करें या किसी को समझाकर बताएं। सेल्फ-रेगुलेशन में प्लानिंग, मॉनिटरिंग और रिफ्लेक्शन को शामिल करते हुए स्टडी टाइम को सेगमेंट्स में बांटें, स्पेसिफिक गोल्स सेट करें और प्रोग्रेस ट्रैक करें।
फीलिंग्स अवॉइड करने की जगह एग्जाम एंग्जायटी मैनेज करने पर दें ध्यान
कई बच्चों को परीक्षा से पहले एंग्जायटी फील हो सकती है। ऐसे में उसे दबाना उल्टा पड़ सकता है। इसे जर्नलिंग से हैंडल करें। इसके लिए टेस्ट से पहले चिंताओं को लिखें। 'मैं नर्वस हूं लेकिन मैं तैयार हूं', ऐसा माइंडसेट बनाकर रखें।
बड़े ऑब्जेक्टिव्स से छोटी सफलताओं की ओर शिफ्ट
बड़े गोल्स ओवरव्हेल्मिंग होते हैं जबकि छोटे सब-गोल्स मोटिवेशन बढ़ाते हैं। पूरी 'केमिस्ट्री पढ़नी है' की जगह 'pH फॉर्मूला मास्टर करना है' या 'एक सैंपल पेपर पूरा करना है' जैसे गोल्स सेट करें।
रटने की मानसिकता को बदलकर सेल्फ-रेगुलेशन की ओर शिफ्ट करें
रटना व्यस्तता का भ्रम देती है जबकि सेल्फ-रेगुलेशन में प्लानिंग, मॉनिटरिंग और रिफ्लेक्शन शामिल है। इसके लिए स्टडी टाइम को सेगमेंट्स में बांटें, स्पेसिफिक गोल्स सेट करें और प्रोग्रेस ट्रैक करें।